बेटे गिनते धन दौलत


न धन की थी वह रखवाली,
न सोने चाँदी की थी शान।
ममता जिसकी पूँजी बनकर,
भरती रहती सबकी जान॥

बेटे गिनते धन दौलत को,
घरआँगन में उठते प्रश्न।
किसके हिस्से खेत खलिहान,
किसको मिलेगा धन संपन्न॥

कोने में बैठा नन्हा मन,
सब कुछ चुपचाप निहार रहा।
दादी की सूनी चौखट पर,
मानवता को हार रहा॥

जिसने जीवन अर्पित कर दिया,
हर सुख अपने बच्चों पर।
अपने आँसू पीती रही,
झूठी मुस्कानों के दम पर ॥

कभी चूड़ियाँ, कभी कंगन,
कभी गले का हार बिका।
बेटों के हर स्वप्न सजाने,
अपना सारा संसार दिया लुटा॥

पासबुक जब खुलकर बोली,
हर पन्ना त्याग की गाथा था।
अक्षर अक्षर प्रेम लिखा था,
हर आँसू एक परिभाषा था॥

कुल जमा था प्रेम अपार,
वापस कुछ भी पाया नहीं।
माँ ने कभी हिसाब न माँगा,
मन में कोई छाया नहीं।

यह पढ़कर सब सिर झुक बैठे,
अंतरमन भी रोने लगा।
जिसे समझा था केवल वृद्धा,
वह त्याग सागर होने लगा॥

अंतिम पंक्ति ने हृदय पिघलाया
शेष बचे जो थोड़े धन,
उनसे मुझ पर फूल न धरना।
किसी भूखी वृद्धा को भोजन देना,
वहीं मुझे तुम फिर से पाना।

गौरव सेंगर की सीख याद रहे
माँ की सबसे बड़ी पूँजी,
उसके बच्चे होते हैं।
पर सबसे बड़े निर्धन वे,
जो जीते जी माँ बाप को खोते हैं॥

Warm Regards,

Gaurav Singh Sengar

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