बेटे गिनते धन दौलत
न धन की थी वह रखवाली,न सोने चाँदी की थी शान।ममता जिसकी पूँजी बनकर,भरती रहती सबकी जान॥ बेटे गिनते धन दौलत को,घरआँगन में उठते प्रश्न।किसके हिस्से खेत खलिहान,किसको मिलेगा धन संपन्न॥ कोने में बैठा नन्हा मन,सब कुछ चुपचाप निहार रहा।दादी की सूनी चौखट पर,मानवता को हार रहा॥ जिसने जीवन अर्पित कर दिया,हर सुख अपने बच्चों…